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ऐसा देश है मेरा...................।।।।।।।।।।

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लोकतंत्र में पीजा और फेसबुकिया जेनरेशन

about 1 month ago
देश की इस दयनीय हालत के लिए जिम्मेदार ठहराया जाए तो आखिर किसको ? 64 सालों से चले आ रहे संवैधानिक प्रक्रिया और जनता द्वारा चुनकर भेजी गई सरकार के रहते भी अगर देश में भ्रष्टाचार, गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी आदि व्याप्त है, तो इसके लिए केवल संसद में बैठे नेताओं को हीं जिम्मेवार नहीं ठहराया जा सकता, इसके लिए उतनी हीं जिम्मेवार देश की जनता भी है । 15 अगस्त 1947 के दिन से लेकर 26 जनवरी 1950 के दिन तक संविधान के निर्माण में जो समय लगा उसमें संविधान निर्माताओं ने संविधान में सुधार की भी गुंजाइश रखी...

विकास नहीं विमर्श की जरूरत है

about 1 month ago
देश में जाति आधारित आरक्षण या यूँ कहें कि विकास की सीमा से दूर खड़े जाति विशेष को विकास की मुख्यधारा में लाने के उद्देश्य से आरक्षण की व्यवस्था की शुरूआत की गई थी । केवल भारत ही नहीं बल्कि अमेरिका, रूस, चीन, जापान, इंग्लैंड़ और न जाने ऐसे कितने ही देशों में जो पहले से ही साधन संपन्न हैं विकास की मुख्यधारा से कई जातियां आज भी दूर हैं या कहें तो विकास की मुख्यधारा में शामिल होने के लिए प्रसायरत हैं । ऐसे में भारत जैसे विकासशील देश में अगर ऐसी सामाजिक विषमता देखी जा रही है तो ज्यादा आश्चर्य की...

राज्यों में चुनाव या पार्टियों का पंचनामा

about 1 month ago
देश के पांच राज्यों में हाल ही में विधानसभा का चुनाव होना तय हुआ है । वो भी एक ऐसे समय में जब देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रहे आंदोलन की आग बुझ भी नहीं पाई है । केन्द्र सरकार हो या राज्य सरकार भ्रष्टाचार के मुद्दे पर दोनों हीं जनता के कटघरे में खड़े हैं । चुनाव आयोग ने ऐसे समय में देश के उन पांच राज्यों में चुनाव की घोषणा की है जिसमें से एक राज्य ऐसा है जो भारतीय राजनीति की दिशा और दशा तय करने की क्षमता रखता है । इन पांच राज्यों के चुनावों के नतीजे आने वाले समय में देश की राजनीति में कई नये...

देशभक्ति कटघरे में, देश हाशिये पर

about 1 month ago
देश की चौंसठ साल की आजादी और उसके बाद से विकास का घूमता पहिया। दोनों मिलकर सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांप्रदायिक व्यवस्था में जो परिवर्तन लाया है, वह सही मायनों में विचित्र सा है । देश आज जिस हालात से गुजर रहा है उसकी कल्पना मात्र से रोंगटे खड़े हो जाते हैं तो दूसरी तरफ देश में बढ़ रही ऊंची-ऊंची इमारतों की श्रृंखला, सड़कों पर तेज भागती जिंदगी को देखकर खुशी का भी अनुभव होता है । ऐसे में विकास और विचार के दो पाटों के बीच पिस रही जनता का जो हाल हो रहा है, उससे स्पष्ट हो गया कि विकास की परिधि में...

उदारीकरण के बाद का सुनहरा भारत

about 1 month ago
विकास के लिए देश में विदेशी पूंजी निवेश की चाह लिए करीब दो दशक पहले जिस उदारीकरण का सपना देश की जनता को तात्कालीन नरसिंह राव की कांग्रेस सरकार ने दिखाया था उसने आम आदमी को आखिर दिया क्या ? आज जबकि उदारीकरण को २० साल हो चुके हैं तो सबसे बड़ा सवाल यही है । उदारीकरण को लेकर न जाने कितने ही तर्क और कुतर्क दिए जाते हैं लेकिन वास्तविकता क्या है ? यदि इस उदारीकरण को आम आदमी के नजरिए से देखा जाए, जिसके लिए सारी योजनाएं बनती हैं और नीतियों का निर्धारण किया जाता है भले ही उसकी हकीकत कुछ भी हो, तो यह...

मैं और मेरी ज़िंदगी

6 months ago
वो खुशियों भरे दिन थेजो चले गये ज़िंदगी सेअब बची है सिर्फतन्हाई, तिरस्कार और संभावनाओं सेसराबोर दिन का वक्तढ़ूँढना चाहता हूँज़िंदगी के इन दिनों मेंसंभावनाओं की असीम सीमाओं कोसाथ हीं तन्हाई से निपटने का नया रास्तातिरस्कार भरे नज़रों से बचने का एक सुलझा तरीका मैं पहले खुश थाक्योंकि नहीं थातन्हाई का अंधेरा मेरे जीवन मेंन हीं संभावनाओं की तालाश में भटकने का मौका थाऔर तिरस्कार भरी नजरेंतो पास भी नहीं फटकती थींलेकिन कब बचपन से जवानी आईऔर इन तीन नये आयामों नेदस्तक दे दिया मेरे जीवन में पता भी नहीं चल

चाँदग्रहण पर विशेष

6 months ago
Remote_image_1323638691.small कल रात को गौर से चाँद में तुम्हें देखना चाहता थातुम पहले ओझल थी फिर आधी दिखी फिर पूरी नजर आई,तलाश रहा था चाँद में हर लम्हा तेरे चेहरे की परछाईकभी परछाई काली थी फिर लाल हुई फिर सफेद हो गई,ताकता रहा निरंतर उसकी तरफ एकटक होकरपीछे से किसी ने कहा नीचे आ जाओ ग्रहण चांद को लगी है उसे देखा नहीं करते........( गंगेश कुमार ठाकुर)

सर्दियों की धूप और तुम

6 months ago
सर्दियों में खिल उठी गुनगुनी धूपकितना आनंद देती है नामनभावन लगता है कितनासर्दियों की सुबह की धूप काये आसमां पर खिलने का अंदाजमानों हजारों जुदाई के लम्हों के बाद मिला हो मिलन का एक लम्हा मैं महसूस करने लगता हूँ तुम्हें,धूँध वाली वह सुबह मानो तुम्हारी यादों की तस्वीर धूँधली पड़ गई हो जैसेऔर धूप के खिलते हीं तुम्हारी वह धूँधली तस्वीर स्पष्ट होने लगती है मेरे अंदर सर्दी के सुबह की वह ठंढ़ी हवामानो तुम्हारे छुअन की तरहमेरे पूरे जिस्म को कंपकंपा देती हैदिन में सर्द हवाओं के साथधूप की वह गुनगुन

तौबा करता हूँ कुछ सामानों से

6 months ago
तौबा करता हूँ कुछ सामानों से, जैसे कि मैं तौबा करता हूँ, समाज के तुगलकी फरमानों से, तौबा है जंगपसन्द इंसानों से, तौबा है मुल्क की बर्बादी से, तौबा है दुश्मन फरियादी से, तौबा है दहशतगर्द वादी से, तौबा है उफनते जज्बातों से, तौबा है जलती बुझती साखों से, तौबा है सत्ता के अंधे गलियारों से, तौबा है कानून के झुठे खिदमतगारों से, तौबा है झुठे रिश्ते नातेदारों से, तौबा है इज्ज़त के सौदागरों से, तौबा है देश के हर एक गद्दारों से, तौबा है धर्म के ठेकेदारों से, तौबा है पैसे के बने हारों से, तौबा है जुर्म...

शायद हम रूलाते हैं इनको

7 months ago
हवा की सरसराहट की आवाज़ भी कितनी अजीब है ना, जरा सोचिए तो इस आवाज़ में आप क्या-क्या महसूस कर सकते हैं, कभी अंधेरे में सुनाई दे जाए ये आवाज़ तो ड़र सा महसूस होने लगता है, कभी शांत मन से आप बैठें हों तो यही सरसराहट दिल को सुकून देने लगती है और न जाने इसी तरह आपके अलग-अलग क्षणों में आपके अंदर कितने हीं विचारों और संवेदनाओं को जन्म दे जाती है ये सरसराहट। लेकिन, कभी आपने सोचा है, ये सरसराहटें जहाँ से पैदा होती हैं जहाँ से बनकर,छनकर हमारे पास तक आती हैं, उसमें कितनी कथाऐं, कितनी खुशी, कितनी वेदना,...